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चमोली में ग्लेशियर झीलों के खतरे पर मिलेगी एक घंटे पहले चेतावनी, सीबीआरआई ने तैयार की स्वदेशी तकनीक

ByParyavaran Vichar

Sep 12, 2026

रुड़की। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरों से निपटने के लिए अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किया गया है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की अब चमोली जिले के वसुंधरा ताल में इस स्वदेशी तकनीक को स्थापित करेगा। सिस्टम का उद्देश्य संभावित आपदा की स्थिति में करीब एक घंटे पहले चेतावनी उपलब्ध कराना है।

सीबीआरआई ने इससे पहले इसी तकनीक को मनाली के ढोंडी क्षेत्र में स्थापित किया था। वहां से करीब एक साल से लगातार डेटा प्राप्त किया जा रहा है। अब उसी अनुभव और तकनीक के आधार पर वसुंधरा ताल में सिस्टम लगाया जाएगा।

बारिश, बर्फबारी और जलस्तर पर रहेगी नजर

सीबीआरआई के निदेशक प्रो. आर. प्रदीप कुमार के अनुसार, झील के पास एक विशेष टॉवर स्थापित किया जाएगा। इसमें कई आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे, जो लगातार बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों की निगरानी करेंगे।

सिस्टम से मिलने वाला डेटा और तस्वीरें रीयल टाइम में निगरानी केंद्र तक पहुंचेंगी। यदि झील में कोई असामान्य गतिविधि होती है, जैसे हिमखंड का गिरना, जलस्तअर्ली वार्निंग सिस्टम के सेंसर सेटेलाइट से जुड़े होंगे। घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे। इससे विशेषज्ञों को झील में होने वाले बदलावों की तत्काल जानकारी मिल सकेगी और संभावित खतर का अचानक बढ़ना या प्राकृतिक बांध में दरार पड़ना, तो सेंसर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज सकेंगे।

सेटेलाइट से जुड़े होंगे सेंसर

अर्ली वार्निंग सिस्टम के सेंसर सेटेलाइट से जुड़े होंगे। घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे। इससे विशेषज्ञों को झील में होने वाले बदलावों की तत्काल जानकारी मिल सकेगी और संभावित खतरे का आकलन कर समय रहते चेतावनी जारी की जा सकेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी कारण से वसुंधरा ताल टूटता है तो पानी और मलबे का तेज बहाव करीब 20 किलोमीटर नीचे तक महज आठ से दस मिनट में पहुंच सकता है। ऐसे में समय रहते मिलने वाली चेतावनी संवेदनशील इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

आपदा से पहले तैयारी में मिलेगी मदद

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की संख्या और उनसे जुड़े जोखिम को देखते हुए इस तरह की तकनीक को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राज्य सरकार और सीबीआरआई मिलकर ग्लेशियर झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम का दायरा बढ़ा रहे हैं।

इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य संभावित ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जैसी घटनाओं की पहचान जल्द करना और प्रभावित क्षेत्रों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाना है, ताकि जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।

इस स्वदेशी तकनीक के डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डी.पी. कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।

 

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