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जाली प्रमाणपत्रों से हथियाई गईं सरकारी नौकरियां, बाहर के लोगों ने मार लिया पहाड़ के युवाओं का हक

ByParyavaran Vichar

Nov 6, 2025

नैनीताल। उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में सहायक अध्यापक भर्ती के नाम पर बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। जांच में सामने आया है कि लगभग 40 बाहरी अभ्यर्थियों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरियां हासिल कर लीं। इन लोगों ने न केवल उत्तराखंड के मेहनती और योग्य युवाओं का हक छीना, बल्कि सिस्टम की आंखों में धूल झोंककर खुद को राज्य का निवासी दिखा दिया। यह मामला राज्य की भर्ती प्रणाली और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

वर्ष 2024 में प्राथमिक विद्यालयों में डीएलएड (D.El.Ed) धारकों के लिए सहायक अध्यापक के पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी। ऊधम सिंह नगर जिले में इस प्रक्रिया के तहत कुल 309 पद स्वीकृत किए गए, जिनमें से 256 पदों पर नियुक्तियां पूरी की गईं। मगर अब जांच में यह खुलासा हुआ है कि इनमें लगभग 40 ऐसे लोग शामिल हैं, जिन्होंने फर्जी स्थायी निवास प्रमाणपत्र लगाकर उत्तराखंड निवासी होने का दावा किया। ये सभी अभ्यर्थी असल में उत्तर प्रदेश के निवासी थे और वहीं से उन्होंने डीएलएड प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2017 में यह स्पष्ट शासनादेश जारी किया था कि डीएलएड प्रशिक्षण केवल उन्हीं को दिया जाएगा जो उत्तर प्रदेश के स्थायी निवासी हैं। इसके बावजूद इन अभ्यर्थियों ने पहले यूपी का स्थायी निवास प्रमाणपत्र लगाकर प्रशिक्षण लिया और बाद में जब उत्तराखंड में भर्ती निकली तो जाली दस्तावेजों के माध्यम से खुद को उत्तराखंड निवासी दिखाकर नौकरी हासिल कर ली।

भर्ती प्रक्रिया में ये फर्जी अभ्यर्थी मेरिट सूची में शामिल हुए, नियुक्ति पत्र पाए और शपथपत्र भरकर सरकारी सेवा में शामिल हो गए। अब जब जांच एजेंसियों ने उनके दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की तो खुलासा हुआ कि उनका स्थायी निवास प्रमाणपत्र उत्तराखंड का जाली था।

अब शिक्षा विभाग ने ऐसे 40 संदिग्ध सहायक अध्यापकों को रडार पर लिया है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इन शिक्षकों की सेवा अभिलेख, प्रमाणपत्रों की वैधता और निवास प्रमाणपत्र जारी करने वाली तहसीलों की भूमिका की भी गहन जांच की जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि एक व्यक्ति एक ही समय में दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड—का स्थायी निवासी कैसे हो सकता है।

तहसील प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है। यह जांच का विषय है कि किन आधारों पर इन बाहरी अभ्यर्थियों को उत्तराखंड निवासी का प्रमाणपत्र जारी किया गया। माना जा रहा है कि विभागीय स्तर पर मिलीभगत के बिना ऐसा संभव नहीं था। अब सरकार से उम्मीद की जा रही है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति राज्य के युवाओं के अधिकारों पर इस तरह डाका न डाल सके।

 

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