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कैमरा बंद…तो खत्म हुई मदद: मानसून बीता, नेता-अफसर भूल गए आपदा पीड़ित, हड़बाड़ गांव में बस गूंज रही सिसकियां

ByParyavaran Vichar

Nov 11, 2025

बागेश्वर।राज्य स्थापना की रजत जयंती के उत्सवों के बीच यदि कोई सबसे बड़ी विडंबना दिखती है, तो वह बागेश्वर जिले के जाख-हड़बाड़ गांव की है—जहां आपदा से उजड़े परिवार आज भी राहत की उम्मीद में आसमान ताक रहे हैं। अगस्त महीने में आई भीषण बारिश ने नौ परिवारों का सब कुछ लील लिया। उस वक्त कैमरों की रोशनी थी, नेताओं के जत्थे और अधिकारियों की गाड़ियां थीं, संवेदनाओं के शब्द थे… लेकिन अब जब कैमरे बंद हो गए हैं, तब गांव की गलियों में बस सिसकियां गूंज रही हैं।

13 अगस्त की रात हड़बाड़ में तबाही का वह मंजर किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। लगातार बारिश ने गैर तोक इलाके में धरती को चीर दिया। सड़कें फट गईं, मकान झुक गए, खेत और बगीचे बह गए। नौ परिवारों के घर मलबे में तब्दील हो गए। उस वक्त केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और दिल्ली से आई केंद्रीय टीमों के दौरे हुए, निरीक्षण हुआ, फाइलें बनीं… लेकिन तीन महीने बाद कोई यह देखने नहीं आया कि वे लोग अब कहां हैं, कैसे जी रहे हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना कमला देवी का छोटा घर अब दरकते सपनों की जगह बन चुका है। गांव की पेयजल लाइन टूटी पड़ी है, बिजली के खंभे झुके हैं, और सड़कें मलबे में दबी हैं। जगदीश सिंह, गोपाल सिंह, पूरन राम, ललित सिंह, नंदा बल्लभ पांडे—सभी के घर और दुकानें मिट्टी में मिल गईं। बुजुर्ग बसंती देवी की आंखों में अब बस चिंता है—कहती हैं, “चार बच्चों का परिवार है, मगर सिर छुपाने को छत नहीं।”

जिला आपदा नियंत्रण कक्ष का रिकॉर्ड कहता है कि नौ परिवारों को अस्थायी रूप से पंचायत घर, प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र में शिफ्ट किया गया। लेकिन वे जगहें अब राहत शिविर से ज्यादा खुद एक नई आपदा का रूप ले चुकी हैं। बच्चों के पढ़ने के बाद रात में वही कमरे इन बेघर परिवारों की शरणस्थली बनते हैं। वहां न निजता है, न सुविधा। खाना राहत किट पर टिका है और उम्मीद बस अगले आदेश पर।

पूर्व सैनिक सूबेदार उदय सिंह, जिन्होंने कारगिल में पाकिस्तान को धूल चटाई और श्रीलंका में भारतीय शांति सेना का हिस्सा रहे, अब अपने उजड़े परिजनों के साथ राहत शिविर में दिन गुजार रहे हैं। वे भावुक होकर कहते हैं, “हमने सीमा पर दुश्मन को हराया, लेकिन अपने ही सिस्टम से हार गए।”

गांव के लोग कहते हैं, कैमरों की चमक तक सरकार जिंदा लगती है, उसके बाद सबकुछ सन्नाटा हो जाता है। राहत की फाइलें बनती हैं, फोटो खींचे जाते हैं, दौरे होते हैं—मगर राहत कभी गांव नहीं पहुंचती।

राजनीतिक बयान और वादे
भाजपा विधायक सुरेश गढ़िया का कहना है कि हड़बाड़ के प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जल्द समाधान निकाल लिया जाएगा।
वहीं कांग्रेस विधायक और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा, “यह केवल बागेश्वर की नहीं, पूरे प्रदेश की कहानी है। अधिकारी सिर्फ कागजी बातें करते हैं, उनकी जवाबदेही तय नहीं होती।”

हकीकत यह है कि सर्दी दरवाजे पर है और जाख-हड़बाड़ गांव अब भी टूटी दीवारों और फटी धरती के बीच सिसक रहा है। नौ परिवार जिनके पास न जमीन बची है, न घर। बस एक उम्मीद है—कि शायद किसी दिन कोई सचमुच मदद करने आएगा, कैमरा लेकर नहीं, संवेदना लेकर।

 

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