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अब आबादी क्षेत्र में आने से डरेगा भालू, चमोली जिला पंचायत ने शुरू किया ‘डेंजर’ दवा का प्रयोग

ByParyavaran Vichar

Dec 16, 2025

चमोली:
चमोली जिले में नगरों से लेकर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों तक भालू का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। बदरीनाथ और केदारनाथ वन प्रभाग क्षेत्रों में अब तक भालू चार लोगों की जान ले चुका है, जबकि लगभग 24 लोग हमलों में घायल हुए हैं। इसके अलावा 100 से अधिक मवेशी भी भालू का शिकार बन चुके हैं। हालात इतने भयावह हो गए हैं कि शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद होने को मजबूर हैं।

भालू की बढ़ती दहशत को देखते हुए चमोली जिला पंचायत ने एक अभिनव और प्रयोगात्मक पहल की है। जिला पंचायत ने ‘डेंजर’ नाम की विशेष दवा का ग्रामीण क्षेत्रों में वितरण शुरू किया है। अधिकारियों का दावा है कि इस दवा की तीखी दुर्गंध से भालू आबादी क्षेत्रों की ओर रुख नहीं करेगा। इस दवा को गांवों की सीमाओं, आम रास्तों और पैदल मार्गों पर छिड़काव किया जाएगा, ताकि भालू पहले ही सतर्क होकर दिशा बदल ले।

जिला पंचायत ने इस पहल के तहत दवा के छिड़काव के लिए 60 विशेष मशीनें भी खरीदी हैं। पहले चरण में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में नंदानगर विकास खंड की दस ग्राम पंचायतों में लागू किया गया है। जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट ने इन गांवों में दवा और छिड़काव मशीनों का वितरण करते हुए कहा कि यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे जिले के सभी गांवों में इसे लागू किया जाएगा।

इससे पहले जिला पंचायत ने ग्रामीण पैदल रास्तों के आसपास की झाड़ियों का कटान भी कराया था, लेकिन इसके बावजूद भालू की गतिविधियों में कोई खास कमी नहीं आई। ऐसे में अब इस रासायनिक उपाय से लोगों को राहत दिलाने की कोशिश की जा रही है। जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी तेज सिंह ने बताया कि यह दवा तरल और दानेदार गोली दोनों रूपों में उपलब्ध है और इसकी गंध इतनी तीखी है कि भालू पास आने से बचता है।

विकास भवन परिसर में मुख्य विकास अधिकारी डॉ. अभिषेक त्रिपाठी ने ग्रामीणों को ‘डेंजर’ दवा के पैकेट वितरित किए। उन्होंने कहा कि जनपद के कई ग्रामीण क्षेत्र जंगली जानवरों की समस्या से लंबे समय से जूझ रहे हैं और यह पहल किसानों तथा ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। साथ ही उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि ग्रामीणों को दवा के सही और सुरक्षित उपयोग के बारे में जागरूक किया जाए, ताकि इसका अधिकतम लाभ मिल सके।

प्रशासन को उम्मीद है कि इस प्रयोग से मानव–वन्यजीव संघर्ष में कमी आएगी और ग्रामीणों को भालू की दहशत से राहत मिल सकेगी। यदि परिणाम सकारात्मक रहे, तो यह मॉडल अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।

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