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देहरादून का ‘द साइलेंट बिस्ट्रो’, जहां मूक-बधिर युवा साकार कर रहे सपने देहरादून।

ByParyavaran Vichar

Jan 12, 2026

देहरादून।
राष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर राजधानी देहरादून के सहस्रधारा क्षेत्र में स्थित ‘द साइलेंट बिस्ट्रो’ युवाओं की जिजीविषा और आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभरा है। सितंबर 2025 में शुरू हुआ यह कैफे खास इसलिए है क्योंकि यहां काम करने वाले 10 कर्मचारियों में से 7 मूक-बधिर हैं, जो इशारों की भाषा (साइन लैंग्वेज) में संवाद करते हैं।

कैफे में परोसे जाने वाले व्यंजन भले ही सामान्य हों, लेकिन इन्हें बनाने से लेकर ग्राहकों तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की कहानी कहती है। यहां नेपाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से आए मूक-बधिर युवा काम कर रहे हैं।

संकेतों की भाषा से बनता है संवाद
कैफे के कर्मचारी चाहते हैं कि भारत में अधिक से अधिक लोग साइन लैंग्वेज सीखें, ताकि मूक-बधिर लोगों को रोजमर्रा के जीवन में संवाद की बाधा न झेलनी पड़े। कैफे में कार्यरत समरीन बताती हैं कि विदेशी ग्राहक अक्सर साइन लैंग्वेज समझ लेते हैं, जिससे बातचीत सहज हो जाती है, जबकि भारत में अभी बहुत कम लोग इस भाषा से परिचित हैं।

पूरी दुनिया घूमने का सपना
23 वर्षीय समरीन देहरादून की रहने वाली हैं। उन्होंने बजाज इंस्टीट्यूट से पढ़ाई पूरी कर मुंबई के ताज होटल में इंटर्नशिप की। बाद में संवाद की दिक्कतों के कारण निजी रेस्टोरेंट की नौकरी छोड़नी पड़ी, लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने ‘द साइलेंट बिस्ट्रो’ से जुड़कर अपने सपनों को नई दिशा दी। उनका सपना है कि वह दुनिया घूमकर अलग-अलग देशों में काम करें।

हर दिन मिलती है प्रेरणा
कैफे के असिस्टेंट मैनेजर गौरीशंकर, जो टिहरी गढ़वाल से हैं, बताते हैं कि यहां काम करना उन्हें रोज प्रेरणा देता है। मूक-बधिर युवाओं का हौसला देखकर उनके अपने संघर्ष छोटे लगने लगते हैं।

बहनों की अनोखी साझेदारी
कैफे में काम करने वाली आयुषी और तनिष्का सगी बहनें हैं। 23 वर्षीय आयुषी मूक-बधिर हैं, जबकि 21 वर्षीय तनिष्का साइन लैंग्वेज के माध्यम से स्टाफ और ग्राहकों के बीच संवाद की कड़ी हैं। आयुषी ने बचपन से साइन लैंग्वेज सीखी और पढ़ाई के बाद निजी कंपनी में नौकरी भी की। आज वह ‘द साइलेंट बिस्ट्रो’ से जुड़कर अपने जैसे अन्य युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

आयुषी का सपना है कि वह देश-विदेश में बच्चों को पढ़ाएं। उनकी खामोशी को शब्द देती हैं उनकी बहन तनिष्का, जो कहती हैं कि इन युवाओं के साथ काम करना उनके लिए एक खूबसूरत और प्रेरणादायक अनुभव है।

‘द साइलेंट बिस्ट्रो’ न केवल एक कैफे है, बल्कि यह समाज को समावेशिता, संवेदनशीलता और समान अवसर की नई सोच भी दे रहा है।

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