उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित रैणी गांव से शुरू हुआ चिपको आंदोलन आज भी पर्यावरण संरक्षण की सबसे प्रेरणादायक मिसालों में गिना जाता है। इस ऐतिहासिक आंदोलन की आज 52वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।
सत्तर के दशक में, जब देश में वन संरक्षण के लिए सख्त कानून नहीं थे और जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही थी, तब गांव की महिलाओं ने एक अनोखा तरीका अपनाया। गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया। यही संघर्ष आगे चलकर “चिपको आंदोलन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
26 मार्च 1973 को ठेकेदारों के मजदूर करीब 2500 पेड़ों को काटने रैणी गांव पहुंचे थे। उस समय गांव के पुरुष मुआवजे के सिलसिले में बाहर गए हुए थे। ऐसे में महिलाओं ने ही मोर्चा संभाला। जब मजदूरों ने उनकी बात अनसुनी कर पेड़ों की कटाई शुरू करनी चाही, तो महिलाएं पेड़ों से लिपट गईं और साफ कहा—“पेड़ों से पहले हमें काटना होगा।” इस साहसिक कदम के आगे ठेकेदारों को पीछे हटना पड़ा।
यह आंदोलन धीरे-धीरे जनांदोलन बन गया और देशभर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई चेतना जागी। आज भी स्थानीय महिलाएं मानती हैं कि जंगल उनके जीवन और आजीविका का आधार हैं और उन्हें बचाना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है।
वर्तमान में, सामाजिक संगठनों द्वारा गौरा देवी को मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग उठ रही है। साथ ही, उनके सम्मान में रैणी गांव में बन रहा स्मारक भी पर्याप्त बजट के अभाव में अधूरा पड़ा है।
चिपको आंदोलन न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश और दुनिया के लिए यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास और दृढ़ संकल्प कितना महत्वपूर्ण होता है।
